सवाल कुछ और भी हैं

सामूहिक दुष्कर्म की भर्त्सना तो देश विदेश सभी ओर हो रही है, अब पीडि़ता के निधन के  बाद इसका दंश और भी गहरा हो गया है। आम तौर पर सभी लोग सरकार से कड़े कानून बनाए जाने की मांग भी कर रहे हैं और साथ ही उन नृशंस हत्यारों (केवल दुष्कर्मी कहना पर्याप्त नहीं है) को फांसी की सजा दिये जाने की मांग भी कर रहे हैं। किन्तु मेरे मन में कुछ और बातें भी हैं, जो शेयर करना चाहता हूँ।
1-     क्या सचमुच सरकार (या संबंधित न्यायालय) उन्हें तुरन्त फांसी की सजा सुना देगी ?
2-     यदि फांसी भी दे दी गई तो भी क्या उन्हें तुरन्त फांसी हो सकेगी ? ध्यान रहे महामहिम राष्ट्रपति महोदय को एकमात्र विशेषाधिकार प्राप्त है कि वे किसी की फांसी की सजा को माफ करते हुए उम्रकैद में बदल सकते हैं।
3-     यदि फांसी भी हो गई तो भी क्या हम पुरूष इससे कुछ सबक लेंगे ? सुधरेंगे ? ध्यान रहे हम भी किसी न किसी हद तक बलात्कारी हैं। क्योंकि रास्ते में आती-जाती किसी महिला को घूरने से हमें किसी प्रकार का परहेज नहीं होता। कई बार तो उन पर फब्तियां कसने में भी शर्म नहीं आती। यहां तक कि वही भीड़, जिसकी शक्ल नहीं होती, महिलाओं के सार्वजनिक स्थलों पर कपड़े फाड़ देने के लिए भी जानी जाती है।
4-     बात यहां केवल पुरूषों की ही नहीं कर रहा हूँ, महिलाओं को भी इस बारे में अपनी पीठ थपथपाने देना मैं नहीं चाहता। क्योंकि दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के इस देश में रम्भा और मेनका भी अब आम दिखने लगी हैं।
.... तो सवाल यह है कि क्या करें ? क्या करें, जिससे ऐसी घटनाओं की पुनरावृति न हो ? क्या कानून बन जाने से ये तस्वीर बदल जायेगी ? शायद नहीं। क्या गिनती के इन छ: लोगों को फांसी दे देने से कुछ बदल जायेगा ? यकीनन नहीं। तो फिर क्या करें ???
एक बार फिर से सोचकर देखिये... जवाब आपको अपने अंदर ही मिलेंगे, फिर आप चाहे उन्हें मानें या न मानें ।

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