नेट पर आपकी पहचान

ज‍‍‍ब कभी आप अपने मोबाइल या लैण्डलाइन फोन से किसी को कॉल करते हैं, तो क्या आपकी कॉल को रिसीव करने वाला व्यक्ति केवल आपकी आवाज से ही आपको पहचानता है, या उसका कोई और भी तरीका है ? आप मेरे इस सवाल पर हंस भी सकते हैं, क्योंकि कॉल अटेण्ड करने से पहले ही उसके पास आपका मोबाइल या लैण्डलाइन फोन नम्बर चला जाता है, हो सकता है कि उसने वह नम्बर बाकायदा सेव भी कर रखा हो। लेकिन अगर मैं यही बात आपके कम्प्यूटर से भेजे गये किसी संदेश के बारे में करूं तब ? तब शायद सभी मित्र ठीक से जवाब न दे सकें।

होता यह है कि जब भी आप किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से कोई काम कर रहे होते हैं तब उसकी एक खास पहचान होती है, जिसे उसका ''मैक-आईडी'' कहते हैं। यह उस मशीन की पहचान करने का एक तरीका है। इसे आप अपने एडीएसएल मॉडेम में भी पढ़ सकते हैं (शायद सभी मॉडेम्स में यह सुविधा न भी हो) । सामान्यतया यह मैक आई-डी (या मशीन आइडेंटिटी) यूनिवर्सल होता है, लेकिन आजकल कुछ सॉफ्टवेयर्स की मदद से इसकी नकल भी बना ली जाती है, जिसे इसकी क्लोनिंग करना कहा जाता है।

लेकिन ठहरिये.. केवल ये जानना काफी नहीं है। आम तौर पर इससे कई चीजों की जानकारी नहीं मिल पाती है, इसलिए सामान्यतया मैनुफैक्चरर (कम्पनियां) भी इसे एक अन्य आई डी असाइन करती हैं (इस‍के लिए निर्धारित करती हैं), जिसे इसका ESN भी कहते हैं, इसे शायद टाटा और रिलायंस जैसी कम्पनियों के CDMA फोन रखने वाले दोस्त पहचानते होंगे। इससे उसके मैनुफैक्चरर, उसके बैच और सीरियल नम्बर सरीखी जानकारी मिलती है, GSM फोनों में इसे IMEI के नाम से भी जाना जाता है। 

जब भी आप अपने मोबाइल से किसी को फोन करते हैं, तब आपके फोन का SIM या UIM (एक ही बात है, GSM वाले उसे सिम कहते हैं, CDMA वाले उसे UIM कहते हैं, वैसे तकनीकी रूप से दोनों में फर्क भी है) कार्ड आपके मोबाइल सेवा प्रदाता को यह सूचना (आपसे बिना पूछे हर बार) भेज देता है कि xyz मोबाइल नम्बर वाली चिप से, abc वाले मोबाइल हैण्डसेट से, जो कि 123 नं. टावर से सिग्नल भेज रहा है और रिसीव कर रहा है, किसी रामलाल भाटिया को फोन कर रहा है। ठीक इसी तरह से आपका कम्प्यूटर भी इंटरनेट सेवा प्रदाता को सूचनाएं भेजता है (आपसे बिना पूछे, आपको बिना बताए)।

आप गूगल में टाइप करिये what is my ip और आपको कई ऐसी वेबसाइटें मिल जाएंगी जो कि आपको आपका IP ऐड्रेस बताती हों। आपका आई पी ऐड्रेस इंटरनेट पर आपकी (या यूं कहना ज्यादा ठीक होगा कि आपके कम्प्यूटर/मोबाइल की, जिससे कि आप इंटरनेट चला रहे हैं) पहचान है, और यह यूनिवर्सल है, ले‍किन ठहरिये... यूनिर्वसल तो है, पर एक ही आईपी ऐड्रेस भी दुनिया में बहुत सारे लोगों का हो सकता है, परन्तु कोई आई पी ऐड्रेस किसी सर्वर पर उस कम्प्यूटर या अन्य डिवाइस की उपस्थिति की आई डी होते हैं, और हर सर्वर का फिर से कोई न कोई आई पी ऐड्रेस (जिसे यहां थोडी देर के लिए हम सबनेट कह सकते हैं) । वैसे सबनेट किसी सर्वर (कम्प्यूटर या कोई अन्य डिवाइस) के जरिये कनेक्टिविटी को और आगे तक फैलाने के लिए अधिकतम कनेक्शनों की सीमा रेखा का नाम है।

तो इस प्रकार आपका आई पी एड्रेस अगर 123.123.123.123 है, तो वह किसी न किसी सर्वर पर रजिस्टर होगा। उस सर्वर का भी कोई IP होगा, जो कि फिर किसी सर्वर द्वारा दिया गया होगा। इसी तरह अनेक लोगों को एक ही IP ऐड्रेस भी मिला हुआ होता है, पर फिर भी रूट (सबनेट) के द्वारा उन्हें पहचाना जा सकता है।

आम तौर पर आपका इंटरनेट सर्विस प्रदाता आपको डायनैमिक IP (जो कि कुछ समय बाद बदलता रहता है) देता है, अधिकतम ग्राहकों को कम क्षमता के बावजूद इंटरनेट कनेक्टिविटी देने के लिए ऐसा किया जाता है, क्योंकि सभी उपभोक्ता एक ही समय में ऑनलाइन हों, ऐसा आम तौर पर नहीं होता। खैर सामान्य उपभोक्ता के लिए इसमें कोई बुराई भी नहीं है।

लेकिन अगर आप चाहें और मांगें, तो आपका इंटरनेट सर्विस प्रदाता आपको स्टैटिक आई पी ऐड्रेस भी दे सकता है, हो सकता है कि कुछ सेवा प्रदाता (आपके प्लान के मुताबिक) इसके लिए आपसे कोई शुल्क (Fee) भी ले।  लेकिन इसके अपने फायदे हैं। अगर आप इंटरनेट से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण काम करना चाहते हैं, तो शायद आपको STATIC IP (जिसे FIXED IP भी कहते हैं), ले लेना चाहिए ।

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