हिन्दू, हिन्दुत्व और ''हिन्दू-राष्ट्रवाद''

सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं एक सामान्य हिन्दू परिवार में पैदा हुआ व्यक्ति हूं, सह-अस्तित्व मेरे संस्कारों का एक अंश है।

इन दिनों सोशियल मीडिया पर नरेन्द्र मोदी के अनगिनत तथाकथित समर्थक दिख रहे हैं। किसी लोकतांत्रिक देश के लिए यह खुशी की बात होनी चाहिए कि देश का एक बहुत बड़ा वर्ग किसी एक नेता के नेतृत्व में विश्वास रखता हो।

लेकिन मैंने पिछले कुछ समय में ऐसा भी देखा है जबकि ये नरेन्द्र मोदी के तथाकथित समर्थक, मोदी का समर्थन केवल इस कारण करते हैं कि मोदी ने जालीदार टोपी नहीं पहनी।

मेरे ख्याल से राष्ट्रवादी हिन्दू होना ज्यादा जरूरी है बजाय हिन्दू-राष्ट्रवादी होने के। वैसे भी अगर हम हिन्दू धर्म की गहराइयों में जाने का प्रयास करें तो हम पायेंगे कि हिन्दुत्व तो सहअस्तित्व का ही एक नाम है। हिन्दू धर्म में कहीं भी किसी को मार डालने या किसी से द्वेष रखने की बात नहीं कही गयी। बल्कि हिन्दू धर्म तो नदियों, पहाड़ों, हिमखण्डों, ग्रह-नक्षत्रों एवं जीव-मात्र को पूजनीय मानता है।

हम सभी जानते हैं कि हिन्दू धर्म में चींटिंयों को आटा डालने का समर्थन प्राप्त है, मछलियों को दाना डालने का समर्थन प्राप्त है, सूर्य को अर्द्ध्य देने को समर्थन प्राप्‍त है। चंद्रमा को अर्द्ध्य देने को भी समर्थन प्राप्त है। वन्यजीवों के भी उन्मुक्त वातावरण में अभयचारण को समर्थन प्राप्त है। हिन्दू धर्म में जीव-मात्र की सेवा तथा संरक्षा की बात लगभग प्रत्येक ग्रंथ में कही गई है, फिर आज हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य क्यों ?

क्या नरेन्द्र मोदी की एकमात्र योग्यता यही रह गई है कि वह खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी कहना पसंद करते हैं बजाय राष्ट्रवादी हिन्दू कहलाने के ? यदि हां, तो हमें फिर से विचार करना चाहिए कि क्या वह प्रधानमंत्री पद के लायक भी हैं ?

हिन्दू धर्म निश्चित ही गर्व करने योग्य है। विश्व के किसी कोने में ऐसा कोई मज‍हब नहीं जो कि हिन्दूधर्म की बराबरी करने लायक हो, किन्तु ऐसा कहने के पीछे मेरा पूर्वाग्रह नहीं बल्कि वे हिन्दूत्व की मूल अवधारणाएं हैं।

इन दिनों इस्लाम पर भी तरह-तरह की तोहमतें लगीं हैं। जिन्हें आधार बनाकर कुछ लोग हिन्दू धर्म को मात्र एक प्रोडक्ट बनाकर उससे तुलना करा रहे हैं, लेकिन ऐसा करके वो लोग हिन्दू धर्म का कुछ भला नहीं कर रहे, बल्कि वे ठीक वही नफरत का भाव हिन्दू धर्म के खिलाफ फैला रहे हैं, जैसा कि आजकल इस्लाम के खिलाफ है। हमें इसे समझने की जरूरत है।

एक छोटा सा उदाहरण भी यहां देना प्रासंगिक होगा कि  1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन के पूर्व एशिया में मुस्लिमों की सर्वाधिक जनसंख्या भारत में ही थी, इतना ही नहीं, वे दूसरे देशों के मुसलमानों की अपेक्षा बहुत अधिक सम्पन्न थे (यह बात मैं अपनी ओर से नहीं कह रहा, आंकड़े बताते हैं)। मजहबी आधार पर मुसलमानों के लिए अलग देश बनाए जाने के बाद उनकी हालत और सुधरने की बजाय पहले से कहीं ज्यादा बिगड़ गई।

आज मुझे अफसोस है यह कहते हुए कि जो काम किसी जमाने में मुस्लिम लीग कर रही थी, लगभग वैसा ही काम कुछ दूसरे लोग कर रहे हैं। बस फर्क इतना सा है कि पिछली बार निशाना मुसलमान थे, इस बार निशाने पर हिन्दू हैं। हमें इस दुर्भावना को समझना है, और उसका निशाना बनने से बचना है। इतना ही नहीं, ऐसे लोगों से अपने प्रियजनों को बचाना भी है।

रही बात हिन्दुत्व के प्रचार-प्रसार की, तो भई लगभग 300 वर्ष गुलाम रहने के बाद भी हिन्दुत्व जीवित रहा है तो इसका एक ही कारण है, कि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। हमें अपनी संस्कृति से जुड़ने की आवश्यकता है, हिन्दूधर्म कोई अपाहिज नहीं, जिसे किसी राजनैतिक दल या किसी संगठन विशेष की आवश्यकता हो।

रही बात नरेन्द्र मोदी की, नरेन्द्र मोदी से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी से पहले यह पूछा जाना चाहिए कि उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में जजों की राजनेताओं द्वारा नियुक्ति के बारे में उनकी क्या राय है ? देशभर में दीमक की तरह फैले भ्रष्टाचार के खात्मे के प्रति उनकी राय व कार्ययोजना क्या है ? खुदरा बाजार में विदेशी पूंजीनिवेश के बारे में उनकी क्या राय है ? दागी नेताओं के विषय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बारे में वह क्या सोचते हैं ? राजनैतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में आने के बारे में वह क्या सोचते हैं ? यदि वह प्रधानमंत्री बनते हैं तो देश को उससे क्या लाभ हो सकने की संभावना है ? यदि इन मुद्दों पर मोदी की राय वर्तमान में सत्ता में बैठे लोगों से अलग नहीं है, तो किस आधार पर मोदी को प्रधानमंत्री पद के योग्य या वर्तमान में सत्ता में बैठे लोगों से अलग समझा जाए ? यदि मोदी की राय इन मुद्दों पर वर्तमान समय में सत्ता में बैठे लोगों से अलग भी है, तो भी उनकी पार्टी के भीतरी खींचतान की स्थिति में कैसे अपने विचारों को मनवा सकेंगे, इस बारे में भी मोदी द्वारा देश को बताए जाने की जरूरत है।

ऐसे ही कुछ और प्रश्न भी हैं या हो सकते हैं, जिनका जवाब मतदाता होने की हैसियत से हमें मिलना चाहिए। एक और बात मैं यहां कह दूं कि किसी भी राजनैतिक दल से मेरा संबंध नहीं है, इसलिए इस लेख को किसी भी दल विशेष से जोड़कर न देखा जाए।

2 टिप्‍पणियां:

Sumant Vidwans ने कहा…

ऐसा लगता है कि आप हिन्दू राष्ट्रवादी और हिन्दू-राष्ट्रवादी के बीच उलझ गए हैं.

दाढ़ीवाला ने कहा…

हो सकता है मित्र....

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